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MP 2018: खंडवा की चार विधानसभा सीटों पर शुरू हुआ चुनावी गणित!

खंडवा [संजय चौबे]। जिले में चिरपरिचित प्रतिद्वंदी कांग्रेस व भाजपा एक बार फिर एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोक कर जनअदालत में खड़े होने की तैयारी में जुट गए है।

विधानसभा चुनाव 2018 को लेकर दोनों दल अपनी चुनावी चौसर जमा रहे हैं। जिले की हरसूद विधानसभा सीट से लगातार छह चुनाव जीतकर डॉ कुँवर विजय शाह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह मंत्रिमंडल के कद्दावर मंत्री है।

सुरक्षित इस सीट से डॉ शाह को फिलहाल न भाजपा में व न ही कांग्रेस से कोई चुनौती दिखाई दे रही है। ऐसा नही है ही मंत्री के क्षेत्र में केवल विकास की गंगा ही बह रही है।

उनके विधानसभा क्षेत्र के कई हिस्से आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे हैं। कुपोषण का दंश आज भी भोले-भाले आदिवासियों की जान का सबसे बड़ा दुश्मन साबित हो रहा है।

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सरकार कुपोषण की रोकथाम के लिए अनेक प्रयोगों पर करोड़ो रूपये खर्च कर रही है, लेकिन नतीजा सिफर आने से विफलता का कलंक जनप्रतिनिधियो व नोकरशाहो के माथे पर लगा है।

स्वास्थ्य सेवाएं तार-तार है। शर्मनाक तो यह है कि प्रसव सड़क पर भी हो रहे हैं। अस्पताल कंपाउंडरों के भरोसे है तो गॉवों में दाई ही डॉक्टर की भूमिका निभा रही है।

छोलाछाप बैखोफ जिंदगियों से खिलवाड़ कर रहे हैं। स्कूलों में न तो विषय के शिक्षक हैं और नहीं बुनियादी सुविधाएं। भवनों की भरमार हैं मगर अतिआवश्यक फर्नीचर, शिक्षक, पेयजल, शौचालय नदारद। स्कूले के शिक्षक अपनी सुविधानुसार ऐसे खोलते व बंद करते हैं। निगरानी वाली निगाहें सुविधा शुल्क का काला चश्मा कर अपने दायित्वों व कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं।

ये नजारे केवल हरसूद विधानसभा क्षेत्र के ही है ऐसा भी नही है। ये खण्डवा, पंधाना, मांधाता विधानसभा क्षेत्रों की स्थायी पहचान बन गए हैं। खण्डवा विधानसभा क्षेत्र से देवेंद्र वर्मा तीन बार जीत कर सत्तासुख भोग रहे हैं। खंडवा शहर के साथ 60 ग्राम पंचायतें भी खण्डवा विधानसभा का हिस्सा है।

इन पर नजर डाले तो नगर निगम की कारगुजारियां भाजपा की चौथी बार जीत में सबसे बड़ा रोड़ा है। कहने को तो खण्डवा जिला मुख्यालय का तमगा लिए हुए है। विकास के नाम पर शहर में मुख्यमार्गों सहित खोदी गई गलियां नजर आ रही हैं।

बेतरतीब यातायात, अंधकार में डूबे चौराहे, असुरक्षित स्कूली बच्चे, सूदखोरों की प्रताड़ना से उजड़ते परिवार, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी दफ्तर, ठेकेदारों, सप्लायरों, दलालो व कालाबाजारियों के चुंगल में दमतोड़ती जनकल्याण की सरकारी योजनाए।

उनसे कदमताल करते जिम्मेदार व विकास के रहनुमा खुद आमनागरिको के लिए बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। सत्ता का वनवास भोगती लचर कांग्रेस ने भाजपाइयों में जहा सत्ता का अहंकार भर दिया है वही जो कहा वही अटल सत्य की आत्मघाती परिपाटी भी। पंधाना, मांधाता में जिस तरह कांग्रेस अपनी चौसर जमा रही है उसके चलते भाजपा को राह आसान नही है।

भाजपा में हालही हुई विभिन्न मौर्चो की नियुक्तियों में दिग्गजों ने जिस तरह काबिलियत को दरकिनार कर पट्ठावाद चलाया है उसको लेकर कार्यकर्ताओ के बड़े तबके में असन्तोष के शोले भड़के हुए हैं।

भाजपा में कार्यकर्ता ही संगठन की रीढ़ माना जाता है जब वो हो नाराज हो तो सकारात्मक नतीजों की आस करना बेवकूफी से कम नही है। भाजपा के लिए खतरे का अलार्म बज गया है। समय रहते भाजपा ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया तो सत्ता के नतीजे उलट भी सकते हैं।

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